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mahabharat 10.1.34: क्रोध से जलते हुए वह महाबली योद्धा बार-बार उस भयानक वन की ओर देखता रहा।   |   mahabharat अध्याय 10.1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  10.1.34 
न लेभे स तु निद्रां वै दह्यमानो हि मन्युना।
वीक्षाञ्चक्रे महाबाहुस्तद् वनं घोरदर्शनम्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
क्रोध से जलते हुए वह महाबली योद्धा बार-बार उस भयानक वन की ओर देखता रहा।
 
Burning with anger, he could not sleep. That mighty warrior looked again and again at the terrifying looking forest. 34.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)