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mahabharat 10.1.32-33: महाराज! बहुमूल्य शयन-शय्या और सब प्रकार की सुख-सुविधाओं से युक्त होने पर भी उन दोनों वीरों को अनाथों की भाँति भूमि पर पड़ा देखकर, थकान और शोक से पीड़ित, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और क्षोभ से भर गया। भरत! उस समय उसे नींद नहीं आई। वह सर्प के समान लम्बी-लम्बी साँसें लेता रहा।   |   mahabharat अध्याय 10.1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 32-33
 
 
श्लोक  10.1.32-33 
तौ तु सुप्तौ महाराज श्रमशोकसमन्वितौ।
महार्हशयनोपेतौ भूमावेव ह्यनाथवत्॥ ३२॥
क्रोधामर्षवशं प्राप्तो द्रोणपुत्रस्तु भारत।
न वै स्म स जगामाथ निद्रां सर्प इव श्वसन्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
महाराज! बहुमूल्य शयन-शय्या और सब प्रकार की सुख-सुविधाओं से युक्त होने पर भी उन दोनों वीरों को अनाथों की भाँति भूमि पर पड़ा देखकर, थकान और शोक से पीड़ित, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा क्रोध और क्षोभ से भर गया। भरत! उस समय उसे नींद नहीं आई। वह सर्प के समान लम्बी-लम्बी साँसें लेता रहा।
 
Maharaj! Despite being provided with a costly bed and all kinds of comforts, seeing those two heroes lying on the ground like orphans, afflicted by fatigue and grief, Drona's son Ashwatthama was overcome by anger and resentment. Bhaarat! He could not sleep at that time. He kept drawing long breaths like a snake.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)