Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 10.1.25: समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारों से सुशोभित आकाश चारों ओर से दिखाई देने वाली जरी की साड़ी के समान प्रतीत हो रहा था।   |   mahabharat अध्याय 10.1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  10.1.25 
ग्रहनक्षत्रताराभि: सम्पूर्णाभिरलंकृतम्।
नभोंऽशुकमिवाभाति प्रेक्षणीयं समन्तत:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
समस्त ग्रह, नक्षत्र और तारों से सुशोभित आकाश चारों ओर से दिखाई देने वाली जरी की साड़ी के समान प्रतीत हो रहा था।
 
The sky, decorated with all the planets, constellations and stars, appeared like a brocade sari visible from all sides. 25.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)