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mahabharat 10.1.2: वे सब इस भय से भयभीत थे कि कहीं शत्रुओं को उनका पता न चल जाए, इसलिए वे शीघ्रतापूर्वक वन की गहराई में गए, घोड़ों को खोल दिया और एक गुप्त स्थान पर बैठ गए॥2॥   |   mahabharat अध्याय 10.1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना   ।   mahabharat पर्व 10: सौप्तिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  10.1.2 
विमुच्य वाहांस्त्वरिता भीता समभवंस्तदा।
गहनं देशमासाद्य प्रच्छन्ना न्यविशन्त ते॥ २॥
 
 
अनुवाद
वे सब इस भय से भयभीत थे कि कहीं शत्रुओं को उनका पता न चल जाए, इसलिए वे शीघ्रतापूर्वक वन की गहराई में गए, घोड़ों को खोल दिया और एक गुप्त स्थान पर बैठ गए॥2॥
 
All of them were afraid that the enemies might find out about their whereabouts. So, in great haste they went into the depths of the forest, untied the horses and sat down in a hidden place.॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)