श्री महाभारत  »  पर्व 10: सौप्तिक पर्व  »  अध्याय 1: तीनों महारथियोंका एक वनमें विश्राम, कौओंपर उल्लूका आक्रमण देख अश्वत्थामाके मनमें क्रूर संकल्पका उदय तथा अपने दोनों साथियोंसे उसका सलाह पूछना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  10.1.13 
आज्ञाप्य पृथिवीं सर्वां स्थित्वा मूर्ध्नि च संजय।
कथमद्य भविष्यामि प्रेष्यभूतो दुरन्तकृत्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
संजय! पहले तो पूरी दुनिया में मेरी ही बात मानी जाती थी और मैं सबका नेता था; आखिर अब मैं दूसरों का गुलाम कैसे हो सकता हूँ? मैंने ही अपने जीवन का अंतिम पड़ाव दुःखद बना लिया है!
 
Sanjay! Earlier my command was followed in the entire world and I was the leader of all; after all how can I be a slave of others now? I myself have made the last phase of my life miserable!
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