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mahabharat 1.97.6: प्रतीप ने कहा- हे सुंदरी! मैं कामवश किसी दूसरे की पत्नी के साथ सहवास नहीं कर सकता। मैं अपनी जाति के बाहर की स्त्री के साथ संबंध नहीं रख सकता। कल्याणी! यह मेरा धर्मानुसार व्रत है।   |   mahabharat अध्याय 1.97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.97.6 
प्रतीप उवाच
नाहं परस्त्रियं कामाद् गच्छेयं वरवर्णिनि।
न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
प्रतीप ने कहा- हे सुंदरी! मैं कामवश किसी दूसरे की पत्नी के साथ सहवास नहीं कर सकता। मैं अपनी जाति के बाहर की स्त्री के साथ संबंध नहीं रख सकता। कल्याणी! यह मेरा धर्मानुसार व्रत है।
 
Pratipa said- Beautiful lady! I cannot have sexual intercourse with another's wife due to lust. I cannot maintain relations with a woman who is not of my caste. Kalyani! This is my vow according to Dharma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)