श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  1.97.31-32 
तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा।
देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथ वाप्सरा:॥ ३१॥
यक्षी वा पन्नगी वापि मानुषी वा सुमध्यमे।
याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
तब राजा शान्तनु ने उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणी में कहा - 'सुमध्यमे! तुम देवी हो, राक्षसी हो, गन्धर्वी हो, अप्सरा हो, यक्षी हो, सर्पिणी हो या मनुष्या हो; हे देवी के समान सुशोभित सुन्दरी! मैं तुमसे प्रार्थना करता हूँ कि तुम मेरी पत्नी बनो।' 31-32॥
 
Then King Shantanu consoled him and said in a sweet voice – 'Sumadhyame! You may be a goddess, a demon, a Gandharvi, an Apsara, a Yakshi, a serpent or a human being; Beautiful lady adorned like a goddess! I beg you to become my wife. 31-32॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शान्तनूपाख्याने सप्तनवतितमोऽध्याय:॥ ९७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शान्तनूपाख्यानविषयक सत्तानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९७॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ६ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं)
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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