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mahabharat 1.97.30: वहाँ विचरण करते हुए पराक्रमी राजा शान्तनु को देखकर वह भी मोहित हो गई। स्नेह के कारण उसके हृदय में सौहार्द की भावना उत्पन्न हो गई। वह भोग-पिपासु स्त्री राजा को देखकर कभी तृप्त नहीं होती थी।   |   mahabharat अध्याय 1.97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.97.30 
सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम्।
स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वहाँ विचरण करते हुए पराक्रमी राजा शान्तनु को देखकर वह भी मोहित हो गई। स्नेह के कारण उसके हृदय में सौहार्द की भावना उत्पन्न हो गई। वह भोग-पिपासु स्त्री राजा को देखकर कभी तृप्त नहीं होती थी।
 
She too was enchanted on seeing the mighty King Shantanu wandering there. Due to affection, a feeling of cordiality arose in her heart. That pleasure-seeker was never satisfied with seeing the king.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)