श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 21-22
 
 
श्लोक  1.97.21-22 
पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव।
त्वामाव्रजेद् यदि रह: सा पुत्र वरवर्णिनी॥ २१॥
कामयानाभिरूपाढॺा दिव्या स्त्री पुत्रकाम्यया।
सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने॥ २२॥
 
 
अनुवाद
'शांतनो! पूर्वकाल में एक दिव्या स्त्री मेरे पास आई थी। वह तुम्हारे कल्याण के लिए ही आई थी। पुत्र! यदि वह सुन्दरी कभी एकान्त में तुम्हारे पास आए, तुम्हारे प्रति कामातुर हो तथा तुमसे पुत्र प्राप्ति की कामना करे, तो उस दिव्या स्त्री से, जो 'आंगणे! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो?' ऐसा प्रश्न न पूछना।
 
‘Shantano! In the past, a divine lady came to me. She had come for your welfare only. Son! If that beautiful lady ever comes to you in solitude, is filled with lust for you and desires to have a son from you, then you should not ask such questions to that divine lady who is beautifully adorned like ‘Aangane! Who are you? Whose daughter are you?’. 21-22.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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