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mahabharat 1.97.17-18h: इसके बाद पुत्र-जन्म की प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीप को अपना वचन याद आया। हे कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियों में श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नी सहित पुत्र प्राप्ति के लिए तप करने लगे।   |   mahabharat अध्याय 1.97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 17-18h
 
 
श्लोक  1.97.17-18h 
पुत्रजन्म प्रतीक्षन् वै स राजा तदधारयत्।
एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीप: क्षत्रियर्षभ:॥ १७॥
तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्य: कुरुनन्दन।
 
 
अनुवाद
इसके बाद पुत्र-जन्म की प्रतीक्षा करते हुए राजा प्रतीप को अपना वचन याद आया। हे कुरुनन्दन! इन्हीं दिनों क्षत्रियों में श्रेष्ठ प्रतीप अपनी पत्नी सहित पुत्र प्राप्ति के लिए तप करने लगे।
 
After this, while waiting for the birth of a son, King Pratipa remembered his words. O son of Kurunandan! During these days, Pratipa, the best among the Kshatriyas, started performing penance along with his wife for a son. 17 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)