श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 97: राजा प्रतीपका गंगाको पुत्रवधूके रूपमें स्वीकार करना और शान्तनुका जन्म, राज्याभिषेक तथा गंगासे मिलना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.97.11 
स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम्।
स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सुश्रोणि! तुम मेरी पुत्रवधू बनो। मैं तुम्हें अपने पुत्र के लिए वरण करती हूँ; क्योंकि वामोरु! तुम यहाँ आकर मेरी उसी जंघा का आश्रय लिए हो, जो पुत्रवधू के पक्ष की है। ॥11॥
 
Sushroni! You become my daughter-in-law. I choose you for my son; because Vaamoru! You have come here and taken shelter of my same thigh, which belongs to the daughter-in-law's side. ॥ 11॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd