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mahabharat 1.96.1-2: वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए, जो सत्यवादी और वीर थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञ करके भगवान इंद्र को प्रसन्न किया और उन यज्ञों के पुण्य से उस पराक्रमी राजा को स्वर्ग की प्राप्ति हुई।'   |   mahabharat अध्याय 1.96: महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 96: महाभिषको ब्रह्माजीका शाप तथा शापग्रस्त वसुओंके साथ गंगाकी बातचीत  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.96.1-2 
वैशम्पायन उवाच
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो राजाऽऽसीत् पृथिवीपति:।
महाभिष इति ख्यात: सत्यवाक् सत्यविक्रम:॥ १॥
सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च।
तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे तत: प्रभु:॥ २॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं, 'हे जनमेजय! इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक एक प्रसिद्ध राजा हुए, जो सत्यवादी और वीर थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और एक सौ राजसूय यज्ञ करके भगवान इंद्र को प्रसन्न किया और उन यज्ञों के पुण्य से उस पराक्रमी राजा को स्वर्ग की प्राप्ति हुई।'
 
Vaishampayana says, 'O Janamejaya! There was a famous king named Mahabhis born in the Ikshvaku dynasty, who was truthful as well as brave. He satisfied Lord Indra by performing one thousand Ashvamedha and one hundred Rajasuya sacrifices and by the virtue of those sacrifices, that powerful king attained heaven. 1-2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)