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mahabharat 1.95.30: यहाँ वंशक्रम का संकेत देने वाले दो श्लोक दिए गए हैं - 'माता धौंकनी के समान होती है। वास्तव में पुत्र अपने पिता का ही होता है; जिससे वह उत्पन्न होता है, वही उस बालक के रूप में प्रकट होता है। दुष्यंत! तुम अपने पुत्र का ध्यान रखो; शकुन्तला का अपमान मत करो।'   |   mahabharat अध्याय 1.95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 95: दक्ष प्रजापतिसे लेकर पूरुवंश, भरतवंश एवं पाण्डुवंशकी परम्पराका वर्णन  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  1.95.30 
अत्रानुवंशश्लोकौ भवत:—
भस्त्रा माता पितु: पुत्रो येन जात: स एव स:।
भरस्व पुत्रं दुष्यन्त मावमंस्था: शकुन्तलाम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
यहाँ वंशक्रम का संकेत देने वाले दो श्लोक दिए गए हैं - 'माता धौंकनी के समान होती है। वास्तव में पुत्र अपने पिता का ही होता है; जिससे वह उत्पन्न होता है, वही उस बालक के रूप में प्रकट होता है। दुष्यंत! तुम अपने पुत्र का ध्यान रखो; शकुन्तला का अपमान मत करो।'
 
Here are two verses indicating the lineage - 'A mother is like a bellows. In reality a son belongs to his father; the one from whom he is born appears in the form of that child. Dushyant! You should take care of your son; do not insult Shakuntala.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)