श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 94: पूरुवंशका वर्णन  »  श्लोक 42-44
 
 
श्लोक  1.94.42-44 
अथाभ्यगच्छद् भरतान् वसिष्ठो भगवानृषि:।
तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्‍गम्याभिवाद्य च॥ ४२॥
अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा।
निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे॥ ४३॥
तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा।
पुरोहितो भवान् नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
इसी समय वसिष्ठ ऋषि उनसे मिलने आए। उन्हें आते देख भरतवंशियों ने बड़े यत्न से उनका स्वागत किया और उन्हें प्रणाम करके नमस्कार किया। फिर उन महामुनि को आदरपूर्वक अपना सर्वस्व समर्पित करके तथा उन्हें उत्तम आसन पर बिठाकर राजा ने स्वयं उनका स्वागत किया और कहा, 'भगवन्! हम पुनः राज्य प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। आप हमारे पुरोहित बनिए।'
 
At this time, the sage Vasishtha came to meet him. Seeing him coming, the Bharata clan welcomed him with great efforts and bowed down to him and offered him obeisance. Then, respectfully surrendering everything to that illustrious sage and making him sit on a good seat, the king himself accepted him and said, 'Lord! We are again trying for the kingdom. Please become our priest.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)