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mahabharat 1.93.d5-d6: उसने देखा कि स्वर्गवासी नहुषनंदन महाराज ययाति आए हैं, किन्तु पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर रहे हैं (वे आकाश में स्थित हैं)। अपने पिता को पहचानकर माधवी ने उन्हें प्रणाम किया। तब वसुमान ने अपनी तपस्वी माता से पूछा और कहा, "हे भगवान्!   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक d5-d6
 
 
श्लोक  1.93.d5-d6 
असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा॥
दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा।
ततो वसुमना:* पृच्छन् मातरं वै तपस्विनीम्॥
 
 
अनुवाद
उसने देखा कि स्वर्गवासी नहुषनंदन महाराज ययाति आए हैं, किन्तु पृथ्वी को स्पर्श नहीं कर रहे हैं (वे आकाश में स्थित हैं)। अपने पिता को पहचानकर माधवी ने उन्हें प्रणाम किया। तब वसुमान ने अपनी तपस्वी माता से पूछा और कहा, "हे भगवान्!
 
She saw that heavenly Nahushanandan Maharaj Yayati has come but is not touching the earth (he is situated in the sky). Recognizing her father, Madhavi bowed to him. Then Vasumana asked his ascetic mother and said.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)