श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक d11-d12
 
 
श्लोक  1.93.d11-d12 
माधव्युवाच
तपसा निर्जिताँल्लोकान् प्रतिगृह्णीष्व मामकान्।
पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम्॥
स्वार्थमेव वदन्तीह ऋषयो वेदपारगा:।
तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज॥
 
 
अनुवाद
माधवी बोली- पिताश्री! आप मेरे तप से प्राप्त हुए लोकों को स्वीकार करें। वेद-वेत्ता ऋषिगण कहते हैं कि धर्मपूर्वक आचरण करने से पुत्रियों और पौत्रियों द्वारा प्राप्त किया गया धन भी पुत्र-पौत्रों के समान ही हमारे लिए है; अतः आप हमारे दान और तप से उत्पन्न पुण्य के साथ स्वर्ग में जाएँ।
 
Madhavi said— Father! You accept the worlds which I have gained by penance. The Vedas-knowledgeable sages say that the wealth obtained by daughters and granddaughters through religious conduct is also for us, just like sons and grandsons; hence you go to heaven with the charity of us and the virtues generated by penance.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)