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mahabharat 1.93.7: ययाति बोले - हे प्रभु! जो भी ऋषि-मुनि आपसे कुछ मांगने आए, आपने मन से तो क्या, वाणी से भी उनका अपमान नहीं किया। इसी कारण स्वर्ग में आपके लिए अनंत लोक हैं, जो विद्युत के समान तेजस्वी, नाना प्रकार के मधुर वचनों से युक्त और महान हैं।   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.93.7 
ययातिरुवाच
यत् त्वं वाचा हृदयेनापि साधून्
परीप्समानान् नावमंस्था नरेन्द्र।
तेनानन्ता दिवि लोका: श्रितास्ते
विद्युद्रूपा: स्वनवन्तो महान्त:॥ ७॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - हे प्रभु! जो भी ऋषि-मुनि आपसे कुछ मांगने आए, आपने मन से तो क्या, वाणी से भी उनका अपमान नहीं किया। इसी कारण स्वर्ग में आपके लिए अनंत लोक हैं, जो विद्युत के समान तेजस्वी, नाना प्रकार के मधुर वचनों से युक्त और महान हैं।
 
Yayati said - O Lord! Whichever saint came to you to ask for something, you never insulted them even in your mind, let alone words. Because of this, there are infinite worlds in heaven for you, which are as radiant as electricity, are endowed with various sweet words and are great.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)