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mahabharat 1.93.4: ययाति ने कहा, "मुझे याद नहीं कि मैंने कभी धोखे से कोई खरीद-बिक्री की हो या कोई बेकार चीज़ ली हो। मैं समय के चक्र से आशंकित रहता हूँ। मैं वह नहीं कर सकता जो मेरे अतीत के अन्य महापुरुषों ने नहीं किया, क्योंकि मैं अच्छे कर्म करना चाहता हूँ।"   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.93.4 
ययातिरुवाच
न मिथ्याहं विक्रयं वै स्मरामि
वृथा गृहीतं शिशुकाच्छङ्कमान:।
कुर्यां न चैवाकृतपूर्वमन्यै-
र्विधित्समान: किमु तत्र साधु॥ ४॥
 
 
अनुवाद
ययाति ने कहा, "मुझे याद नहीं कि मैंने कभी धोखे से कोई खरीद-बिक्री की हो या कोई बेकार चीज़ ली हो। मैं समय के चक्र से आशंकित रहता हूँ। मैं वह नहीं कर सकता जो मेरे अतीत के अन्य महापुरुषों ने नहीं किया, क्योंकि मैं अच्छे कर्म करना चाहता हूँ।"
 
Yayati said, "I do not remember ever buying or selling in a fraudulent manner or taking anything of no avail. I remain apprehensive of the cycle of time. I cannot do what other great men of my past have not done because I want to do good deeds."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)