श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  1.93.28 
वैशम्पायन उवाच
एवं राजा स महात्मा ह्यतीव
स्वैर्दौहित्रैस्तारितोऽमित्रसाह:।
त्यक्त्वा महीं परमोदारकर्मा
स्वर्गं गत: कर्मभिर्व्याप्य पृथ्वीम्॥ २८॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायन कहते हैं - जनमेजय! राजा ययाति महान् महात्मा थे। वे शत्रुओं के लिए अजेय थे और उनके कर्म अत्यंत उदार थे। उनके पौत्रों ने उनका उद्धार किया और अपने पुण्य कर्मों से समस्त जगत को आच्छादित करके वे पृथ्वी छोड़कर स्वर्गलोक चले गए। 28.
 
Vaishampayana says - Janamejaya! King Yayati was a great saint. He was invincible for his enemies and his deeds were extremely generous. His grandsons saved him and after covering the entire world with his good deeds, he left the earth and went to heaven. 28.
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायातसमाप्तौ त्रिनवतितमोऽध्याय:॥ ९३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातसमाप्तिविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९३॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० १/२ श्लोक मिलाकर कुल ४८ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)