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mahabharat 1.93.27: जो मनुष्य हृदय में ईर्ष्या न रखते हुए, श्रेष्ठ द्विजों के समक्ष स्वर्ग को प्राप्त करने वाली हमारी यह कथा कहेगा, वह हमारे समान पुण्य लोकों को प्राप्त होगा॥27॥   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  1.93.27 
यो न: स्वर्गजित: सर्वान् यथा वृत्तं निवेदयेत्।
अनसूयुर्द्विजाग्रॺेभ्य: स लभेन्न: सलोकताम्॥ २७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य हृदय में ईर्ष्या न रखते हुए, श्रेष्ठ द्विजों के समक्ष स्वर्ग को प्राप्त करने वाली हमारी यह कथा कहेगा, वह हमारे समान पुण्य लोकों को प्राप्त होगा॥27॥
 
The person who, without having any jealousy in his heart, narrates this story of us having taken over the heaven in front of the truly superior Dwijas, will attain virtuous worlds like ours. 27॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)