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mahabharat 1.93.25: सत्य के कारण ही पृथ्वी और आकाश स्थित हैं। उसी प्रकार सत्य के कारण ही मनुष्यलोक में अग्नि प्रज्वलित है। मैंने कभी व्यर्थ वचन नहीं कहा; क्योंकि सदाचारी पुरुष सदैव सत्य का आदर करता है॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.93.25 
सत्येन वै द्यौश्च वसुन्धरा च
तथैवाग्निर्ज्वलते मानुषेषु।
न मे वृथा व्याहृतमेव वाक्यं
सत्यं हि सन्त: प्रतिपूजयन्ति॥ २५॥
 
 
अनुवाद
सत्य के कारण ही पृथ्वी और आकाश स्थित हैं। उसी प्रकार सत्य के कारण ही मनुष्यलोक में अग्नि प्रज्वलित है। मैंने कभी व्यर्थ वचन नहीं कहा; क्योंकि सदाचारी पुरुष सदैव सत्य का आदर करता है॥ 25॥
 
It is because of truth that the earth and the sky are sustained. Similarly, it is because of truth that the fire is lit in the world of humans. I have never spoken a useless word; because a virtuous person always respects truth.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)