Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.93.20: राजा शिबि कितने पुण्यात्मा और निर्लज्ज हैं! (उनमें अभिमान की मात्रा स्पर्श भी नहीं होती।) इसीलिए शिबि, हम सब से आगे निकल गए हैं। वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात जिज्ञासावश अष्टकने अपने नाना राजा ययाति से पुनः पूछा कि इन्द्र के समान कौन था? 20॥   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.93.20 
एवंवृत्तो ह्रीनिषेवश्च यस्मात्
तस्माच्छिबिरत्यगाद् वै रथेन।
वैशम्पायन उवाच
अथाष्टक: पुनरेवान्वपृच्छ-
न्मातामहं कौतुकेनेन्द्रकल्पम्॥ २०॥
 
 
अनुवाद
राजा शिबि कितने पुण्यात्मा और निर्लज्ज हैं! (उनमें अभिमान की मात्रा स्पर्श भी नहीं होती।) इसीलिए शिबि, हम सब से आगे निकल गए हैं। वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तत्पश्चात जिज्ञासावश अष्टकने अपने नाना राजा ययाति से पुनः पूछा कि इन्द्र के समान कौन था? 20॥
 
King Shibi is so virtuous and shameless! (The amount of pride in them is not even touched.) That is why Shibi, we have gone ahead of everyone. Vaishampayanji says – Janamejaya! Thereafter, out of curiosity, Ashtakane again asked his maternal grandfather, King Yayati, who was like Indra. 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)