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mahabharat 1.93.2: ययाति बोले - हे राजन! पृथ्वी, आकाश और दिशाओं के जितने लोक सूर्यदेव अपनी किरणों से तपाते और प्रकाशित करते हैं, उतने ही लोक आपके लिए स्वर्ग में स्थित हैं। वे सीमित नहीं, अपितु सनातन हैं और आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ 2॥   |   mahabharat अध्याय 1.93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 93: राजा ययातिका वसुमान् और शिबिके प्रतिग्रहको अस्वीकार करना तथा अष्टक आदि चारों राजाओंके साथ स्वर्गमें जाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.93.2 
ययातिरुवाच
यदन्तरिक्षं पृथिवी दिशश्च
यत्तेजसा तपते भानुमांश्च।
लोकास्तावन्तो दिवि संस्थिता वै
ते नान्तवन्त: प्रतिपालयन्ति॥ २॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - हे राजन! पृथ्वी, आकाश और दिशाओं के जितने लोक सूर्यदेव अपनी किरणों से तपाते और प्रकाशित करते हैं, उतने ही लोक आपके लिए स्वर्ग में स्थित हैं। वे सीमित नहीं, अपितु सनातन हैं और आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ 2॥
 
Yayati said - O King! All the regions of the earth, sky and directions which the Sun God heats and illuminates with his rays, that many worlds are situated in heaven for you. They are not finite but are everlasting and are waiting for you.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)