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mahabharat 1.92.9: अष्टक बोले - महाराज! मैं मानता हूँ कि आप पारमार्थिक धर्म के ज्ञाता हैं। मैं आपसे एक बात पूछता हूँ - क्या अंतरिक्ष या स्वर्ग में कोई पुण्य लोक हैं, जिन्हें मैं प्राप्त कर सकूँ? यदि हैं, तो आपको (उनके प्रभाव से) नीचे नहीं गिरना चाहिए, गिरना नहीं चाहिए॥9॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  1.92.9 
अष्टक उवाच
पृच्छामि त्वां मा प्रपत प्रपातं
यदि लोका: पार्थिव सन्ति मेऽत्र।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि स्थिता:
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ ९॥
 
 
अनुवाद
अष्टक बोले - महाराज! मैं मानता हूँ कि आप पारमार्थिक धर्म के ज्ञाता हैं। मैं आपसे एक बात पूछता हूँ - क्या अंतरिक्ष या स्वर्ग में कोई पुण्य लोक हैं, जिन्हें मैं प्राप्त कर सकूँ? यदि हैं, तो आपको (उनके प्रभाव से) नीचे नहीं गिरना चाहिए, गिरना नहीं चाहिए॥9॥
 
Ashtak said - Maharaj! I believe that you are a knower of the transcendental religion. I ask you one thing - are there any virtuous worlds in the space or heaven that I can attain? If they are, then you should not fall down (due to their effect), you should not fall.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)