Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.92.5: राजन! पापबुद्धि वाले और अधर्माचरण करने वाले पुरुष का आचरण क्रूर (पापपूर्ण) और असत्य कहा गया है। और जिसने अपनी इंद्रियों को वश में नहीं किया है, उसका धन भी उतना ही पापपूर्ण और असत्य है। परंतु वानप्रस्थ साधु द्वारा धर्म का पालन ही सरलता है, यही ध्यान है और यही उत्तम आचरण है। ॥5॥ | mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
राजन! पापबुद्धि वाले और अधर्माचरण करने वाले पुरुष का आचरण क्रूर (पापपूर्ण) और असत्य कहा गया है। और जिसने अपनी इंद्रियों को वश में नहीं किया है, उसका धन भी उतना ही पापपूर्ण और असत्य है। परंतु वानप्रस्थ साधु द्वारा धर्म का पालन ही सरलता है, यही ध्यान है और यही उत्तम आचरण है। ॥5॥
King! The conduct of a man with sinful intellect who commits unrighteous acts is said to be cruel (sinful) and untrue. And the wealth of that person who has not conquered his senses is also equally sinful and untrue. But the observance of Dharma by a Vanaprastha monk is simplicity, it is meditation and it is the best conduct. ॥ 5॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥