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mahabharat 1.92.3: यदि वानप्रस्थ मनुष्य बड़ी आयु प्राप्त करके भी विषयों से व्याकुल होकर उनमें भटकने लगे, विषयों को भोगने के बाद पश्चाताप करे, तो उसे मोक्ष के लिए पुनः तप का अनुष्ठान करना चाहिए ॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.92.3 
अवाप्य दीर्घमायुस्तु य: प्राप्तो विकृतिं चरेत् ।
तप्यते यदि तत् कृत्वा चरेत् सोऽन्यत् तपस्तत:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
यदि वानप्रस्थ मनुष्य बड़ी आयु प्राप्त करके भी विषयों से व्याकुल होकर उनमें भटकने लगे, विषयों को भोगने के बाद पश्चाताप करे, तो उसे मोक्ष के लिए पुनः तप का अनुष्ठान करना चाहिए ॥3॥
 
If a Vanaprastha, even after attaining a great age, gets disturbed by the objects of life and starts wandering in them, if he repents after enjoying the objects, then he should perform the ritual of penance again for salvation. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)