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mahabharat 1.92.17: ययाति बोले - हे राजन! राजा के समान प्रतापी होते हुए भी किसी को दूसरों से पुण्य और कल्याण की कामना नहीं करनी चाहिए। विद्वान राजा को दैव के कारण महान् कष्ट में पड़ने पर भी कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.92.17 
ययातिरुवाच
न तुल्यतेजा: सुकृतं कामयेत
योगक्षेमं पार्थिव पार्थिव: सन्।
दैवादेशादापदं प्राप्य विद्वां-
श्चरेन्नृशंसं न हि जातु राजा॥ १७॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - हे राजन! राजा के समान प्रतापी होते हुए भी किसी को दूसरों से पुण्य और कल्याण की कामना नहीं करनी चाहिए। विद्वान राजा को दैव के कारण महान् कष्ट में पड़ने पर भी कोई पाप कर्म नहीं करना चाहिए।
 
Yayati said - O King! No one, being as glorious as a king, should wish for virtue and welfare from others. A learned king should not commit any sinful act even if he is in great trouble due to the divine.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)