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mahabharat 1.92.16: प्रतर्दन ने कहा- महाराज! मैं आपको वे सब लोक देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो लोक मेरे हैं, वे आपके हो जाएँ। चाहे वे अंतरिक्ष में हों या स्वर्ग में, आप बिना किसी आसक्ति के शीघ्रता से उनमें चले जाएँ॥ 16॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  1.92.16 
प्रतर्दन उवाच
तांस्ते ददानि मा प्रपत प्रपातं
ये मे लोकास्तव ते वै भवन्तु।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-
स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोह:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
प्रतर्दन ने कहा- महाराज! मैं आपको वे सब लोक देता हूँ, आप नीचे न गिरें। जो लोक मेरे हैं, वे आपके हो जाएँ। चाहे वे अंतरिक्ष में हों या स्वर्ग में, आप बिना किसी आसक्ति के शीघ्रता से उनमें चले जाएँ॥ 16॥
 
Pratrdan said— Maharaj! I give you all those worlds, you should not fall down. All the worlds which are mine should become yours. Whether they are in the space or in the heaven, you should quickly go to them without any attachment.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)