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mahabharat 1.92.15: ययाति बोले - नरेन्द्र! तुम्हारे अनेक लोक हैं, यदि तुम प्रत्येक लोक में सात दिन भी रहो, तो भी उनका अन्त नहीं है। उन सभी में अमृत के झरने बहते हैं और वे घी (प्रकाश) से परिपूर्ण हैं। उनमें किसी प्रकार का दुःख नहीं है। वे सभी लोक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ 15॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.92.15 
ययातिरुवाच
सन्ति लोका बहवस्ते नरेन्द्र
अप्येकैक: सप्तसप्ताप्यहानि।
मधुच्युतो घृतपृक्ता विशोका-
स्ते नान्तवन्त: प्रतिपालयन्ति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - नरेन्द्र! तुम्हारे अनेक लोक हैं, यदि तुम प्रत्येक लोक में सात दिन भी रहो, तो भी उनका अन्त नहीं है। उन सभी में अमृत के झरने बहते हैं और वे घी (प्रकाश) से परिपूर्ण हैं। उनमें किसी प्रकार का दुःख नहीं है। वे सभी लोक तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं॥ 15॥
 
Yayati said - Narendra! You have many worlds, even if you stay in each world for seven days, there is no end to them. All of them flow with springs of nectar and are filled with ghee (light). There is absolutely no sorrow in them. All those worlds are waiting for you.॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)