Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.92.14: प्रतर्दन ने कहा - हे मनोवांछित रूप वाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ कि यदि अंतरिक्ष या स्वर्ग में मेरा कोई लोक है, तो कृपया मुझे बताइए। मैं आपको दिव्य धर्म का ज्ञाता मानता हूँ॥ 14॥ | mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
प्रतर्दन उवाच
पृच्छामि त्वां स्पृहणीयरूप
प्रतर्दनोऽहं यदि मे सन्ति लोका:।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता:
क्षेत्रज्ञं त्वां तस्य धर्मस्य मन्ये॥ १४॥
अनुवाद
प्रतर्दन ने कहा - हे मनोवांछित रूप वाले श्रेष्ठ पुरुष! मैं प्रतर्दन हूँ और आपसे पूछता हूँ कि यदि अंतरिक्ष या स्वर्ग में मेरा कोई लोक है, तो कृपया मुझे बताइए। मैं आपको दिव्य धर्म का ज्ञाता मानता हूँ॥ 14॥
Pratrdan said - O best man with desirable form! I am Pratrdan and I ask you, if I have a world in the space or heaven, then please tell me. I consider you to be the knower of the transcendental religion.॥ 14॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥