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mahabharat 1.92.12: ययाति बोले - हे राजनश्रेष्ठ! ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण ही दान स्वीकार करता है। मेरे समान क्षत्रिय कभी नहीं। हे राजन! मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सदैव उसी प्रकार बहुत-सा दान दिया है, जिस प्रकार दान देना चाहिए॥ 12॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  1.92.12 
ययातिरुवाच
नास्मद्विधो ब्राह्मणो ब्रह्मविच्च
प्रतिग्रहे वर्तते राजमुख्य।
यथा प्रदेयं सततं द्विजेभ्य-
स्तथाददं पूर्वमहं नरेन्द्र॥ १२॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - हे राजनश्रेष्ठ! ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण ही दान स्वीकार करता है। मेरे समान क्षत्रिय कभी नहीं। हे राजन! मैंने श्रेष्ठ ब्राह्मणों को सदैव उसी प्रकार बहुत-सा दान दिया है, जिस प्रकार दान देना चाहिए॥ 12॥
 
Yayati said - O best of kings! Only a Brahmin who knows Brahman accepts gifts. Never a Kshatriya like me. O king! I have always given many gifts to the best Brahmins in the manner in which gifts should be given.॥ 12॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)