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mahabharat 1.92.11: अष्टक ने कहा - राजन! मैं तुम्हें स्वर्ग में जितने लोक हैं, वे सब देता हूँ; किन्तु तुम गिरना नहीं। तुम शीघ्र ही आसक्ति रहित होकर अंतरिक्ष या आकाश में मेरे लिए जो स्थान हैं, वहाँ चले जाओ। ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 1.92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 92: अष्टक-ययाति-संवाद और ययातिद्वारा दूसरोंके दिये हुए पुण्यदानको अस्वीकार करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.92.11 
अष्टक उवाच
तांस्ते ददामि मा प्रपत प्रपातं
ये मे लोका दिवि राजेन्द्र सन्ति।
यद्यन्तरिक्षे यदि वा दिवि श्रिता-
स्तानाक्रम क्षिप्रमपेतमोह:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
अष्टक ने कहा - राजन! मैं तुम्हें स्वर्ग में जितने लोक हैं, वे सब देता हूँ; किन्तु तुम गिरना नहीं। तुम शीघ्र ही आसक्ति रहित होकर अंतरिक्ष या आकाश में मेरे लिए जो स्थान हैं, वहाँ चले जाओ। ॥11॥
 
Ashtak said - King! I give you all the worlds that exist for me in heaven; but you must not fall. You must quickly go to the places that exist for me in space or the sky without any attachment. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)