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mahabharat 1.91.3: गृहस्थ को चाहिए कि न्यायपूर्वक प्राप्त धन से यज्ञ करे, दान दे और अतिथियों को सदैव भोजन कराए। दूसरों की वस्तुएँ बिना उनके द्वारा अर्पित किए स्वीकार न करे। यही गृहस्थ-धर्म का प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.91: ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 91: ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.91.3 
धर्मागतं प्राप्य धनं यजेत
दद्यात् सदैवातिथीन् भोजयेच्च।
अनाददानश्च परैरदत्तं
सैषा गृहस्थोपनिषत् पुराणी॥ ३॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ को चाहिए कि न्यायपूर्वक प्राप्त धन से यज्ञ करे, दान दे और अतिथियों को सदैव भोजन कराए। दूसरों की वस्तुएँ बिना उनके द्वारा अर्पित किए स्वीकार न करे। यही गृहस्थ-धर्म का प्राचीन एवं रहस्यमय स्वरूप है॥3॥
 
A householder should perform sacrifices with the wealth obtained through justice, give donations and always feed guests. He should not accept other people's things unless they offer. This is the ancient and mysterious form of householder-dharma.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)