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mahabharat 1.91.18: जब साधु गाय-बैलों की तरह मुख से ही आहार करता है, हाथ आदि का प्रयोग न करके, तब वह इन सब लोकों को जीत लेता है और मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ माना जाता है ॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.91: ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 91: ययाति और अष्टकका आश्रमधर्मसम्बन्धी संवाद  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.91.18 
आस्येन तु यदाहारं गोवन्मृगयते मुनि:।
अथास्य लोक: सर्वोऽयं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
जब साधु गाय-बैलों की तरह मुख से ही आहार करता है, हाथ आदि का प्रयोग न करके, तब वह इन सब लोकों को जीत लेता है और मोक्ष प्राप्त करने में समर्थ माना जाता है ॥18॥
 
When a monk takes his food through the mouth like the cows and bulls, without using his hands etc., then he is considered to have conquered all these worlds and is capable of attaining salvation. ॥18॥
 
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि उत्तरयायाते एकनवतितमोऽध्याय:॥ ९१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें उत्तरयायातविषयक इक्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९१॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)