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mahabharat 1.90.3: अष्टक ने पूछा - स्वर्ग में मनुष्यों के पुण्य कैसे क्षीण हो जाते हैं? इस विषय में मेरा मन अत्यन्त मोहित है। प्रजापति का वह कौन-सा धाम है जहाँ विशिष्ट (पुनरावृत्ति न करने की क्षमता वाले) पुरुष जाते हैं? कृपया मुझे यह बताइए; क्योंकि आप मुझे इस क्षेत्र (आत्मज्ञान) के विशेषज्ञ प्रतीत होते हैं॥3॥   |   mahabharat अध्याय 1.90: अष्टक और ययातिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 90: अष्टक और ययातिका संवाद  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  1.90.3 
अष्टक उवाच
तस्मिन् कथं क्षीणपुण्या भवन्ति
सम्मुह्यते मेऽत्र मनोऽतिमात्रम्।
किं वा विशिष्टा: कस्य धामोपयान्ति
तद् वै ब्रूहि क्षेत्रवित् त्वं मतो मे॥ ३॥
 
 
अनुवाद
अष्टक ने पूछा - स्वर्ग में मनुष्यों के पुण्य कैसे क्षीण हो जाते हैं? इस विषय में मेरा मन अत्यन्त मोहित है। प्रजापति का वह कौन-सा धाम है जहाँ विशिष्ट (पुनरावृत्ति न करने की क्षमता वाले) पुरुष जाते हैं? कृपया मुझे यह बताइए; क्योंकि आप मुझे इस क्षेत्र (आत्मज्ञान) के विशेषज्ञ प्रतीत होते हैं॥3॥
 
Ashtak asked - How do the merits of men get diminished in the heaven? My mind is very fascinated in this matter. Which is that abode of Prajapati where special (those with the ability of not repeating) men go? Please tell me this; because you seem to be an expert in the field (self-knowledge) to me.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)