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mahabharat 1.90.25: विद्वान पुरुष को चाहिए कि सम्मान पाकर प्रसन्न न हो और अपमान पाकर क्रोधित न हो । इस संसार में केवल संत ही सज्जनों का आदर करते हैं । दुष्टों को तो यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह सज्जन है' ॥ 25॥   |   mahabharat अध्याय 1.90: अष्टक और ययातिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 90: अष्टक और ययातिका संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  1.90.25 
न मानमान्यो मुदमाददीत
न संतापं प्राप्नुयाच्चावमानात्।
सन्त: सत: पूजयन्तीह लोके
नासाधव: साधुबुद्धिं लभन्ते॥ २५॥
 
 
अनुवाद
विद्वान पुरुष को चाहिए कि सम्मान पाकर प्रसन्न न हो और अपमान पाकर क्रोधित न हो । इस संसार में केवल संत ही सज्जनों का आदर करते हैं । दुष्टों को तो यह भी ज्ञान नहीं होता कि 'यह सज्जन है' ॥ 25॥
 
A learned man should not be overjoyed when honoured and should not be angry when insulted. In this world only saints respect good men. Evil men do not even get the wisdom that 'this is a good man'.॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)