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mahabharat 1.90.2: ययाति बोले - जैसे इस लोक में चाहे कोई भी जाति-भाई, मित्र या सम्बन्धी क्यों न हो, धन नष्ट हो जाने पर सभी लोग उसे त्याग देते हैं; वैसे ही परलोक में भी जिसका पुण्य समाप्त हो गया हो, उसे देवराज इन्द्र सहित सभी देवता तत्काल त्याग देते हैं॥2॥   |   mahabharat अध्याय 1.90: अष्टक और ययातिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 90: अष्टक और ययातिका संवाद  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  1.90.2 
ययातिरुवाच
ज्ञाति: सुहृत् स्वजनो वा यथेह
क्षीणे वित्ते त्यज्यते मानवैर्हि।
तथा तत्र क्षीणपुण्यं मनुष्यं
त्यजन्ति सद्य: सेश्वरा देवसङ्घा:॥ २॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - जैसे इस लोक में चाहे कोई भी जाति-भाई, मित्र या सम्बन्धी क्यों न हो, धन नष्ट हो जाने पर सभी लोग उसे त्याग देते हैं; वैसे ही परलोक में भी जिसका पुण्य समाप्त हो गया हो, उसे देवराज इन्द्र सहित सभी देवता तत्काल त्याग देते हैं॥2॥
 
Yayati said - Just as in this world, no matter who the caste-brother, friend or relative is, when wealth is destroyed, all people abandon it; Similarly, in the next world, a person whose virtue has ended is immediately abandoned by all the gods including Devraj Indra. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)