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mahabharat 1.90.18: ययाति बोले - राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेता हुआ इस प्राणयुक्त स्थूल शरीर को छोड़कर स्वप्नों में विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन आत्मा इस मृत स्थूल शरीर को अस्फुट शब्दों से छोड़कर सूक्ष्म शरीर से युक्त हो जाता है और फिर पुण्य या पाप को ध्यान में रखते हुए वायु के वेग से गति करता हुआ परलोक में पहुँच जाता है॥18॥   |   mahabharat अध्याय 1.90: अष्टक और ययातिका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 90: अष्टक और ययातिका संवाद  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.90.18 
ययातिरुवाच
हित्वा सोऽसून् सुप्तवन्निष्टनित्वा
पुरोधाय सुकृतं दुष्कृतं वा।
अन्यां योनिं पवनाग्रानुसारी
हित्वा देहं भजते राजसिंह॥ १८॥
 
 
अनुवाद
ययाति बोले - राजसिंह! जैसे मनुष्य श्वास लेता हुआ इस प्राणयुक्त स्थूल शरीर को छोड़कर स्वप्नों में विचरण करता है, वैसे ही यह चेतन आत्मा इस मृत स्थूल शरीर को अस्फुट शब्दों से छोड़कर सूक्ष्म शरीर से युक्त हो जाता है और फिर पुण्य या पाप को ध्यान में रखते हुए वायु के वेग से गति करता हुआ परलोक में पहुँच जाता है॥18॥
 
Yayati said – Raj Singh! Just as a human being, while inhaling, leaves the gross body full of life and wanders in dreams, similarly, this conscious soul leaves this dead gross body with inarticulate words and unites with the subtle body and then keeping good deeds or sins in mind, moves with the speed of the wind and reaches the other world. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)