श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 9: रुरुकी आधी आयुसे प्रमद्वराका जीवित होना, रुरुके साथ उसका विवाह, रुरुका सर्पोंको मारनेका निश्चय तथा रुरु-डुण्डुभ-संवाद  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  1.9.1-3 
सौतिरुवाच
तेषु तत्रोपविष्टेषु ब्राह्मणेषु महात्मसु।
रुरुश्चुक्रोश गहनं वनं गत्वातिदु:खित:॥ १॥
शोकेनाभिहत: सोऽथ विलपन् करुणं बहु।
अब्रवीद् वचनं शोचन् प्रियां स्मृत्वा प्रमद्वराम्॥ २॥
शेते सा भुवि तन्वङ्गी मम शोकविवर्धिनी।
बान्धवानां च सर्वेषां किं नु दु:खमत: परम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! वे ब्राह्मण वहाँ प्रमोदवारा के चारों ओर बैठे हुए थे, उस समय रुरु अत्यन्त दुःखी हो गया और गहन वन में जाकर जोर-जोर से रोने लगा। दुःख से पीड़ित होकर उसने अत्यन्त करुण विलाप किया और अपनी प्रिय प्रमोदवारा का स्मरण करके दुःखी होकर इस प्रकार बोला - 'हाय! वह दुबली-पतली कन्या भूमि पर सोकर मेरा तथा समस्त बन्धु-बान्धवों का दुःख बढ़ा रही है; इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है?॥1-3॥
 
Ugrasravaji says - Shaunakji! Those Brahmins were sitting around Pramodwara there, at that time Ruru became very sad and went into the deep forest and started crying loudly. Being afflicted with grief, he made a very pitiful lamentation and remembering his beloved Pramodwara, he became sad and said in this way - 'Alas! That thin-skinned girl is sleeping on the ground increasing the grief of me and all the relatives; what can be more sad than this?॥1-3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)