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mahabharat 1.89.8: जीव को जो सुख या दुःख होता है, वह प्रारब्ध के कारण होता है, अपने बल से नहीं। अतः प्रारब्ध को ही सबसे बलवान मानकर मनुष्य को किसी भी प्रकार से हर्ष या शोक नहीं करना चाहिए ॥8॥   |   mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 89: ययाति और अष्टकका संवाद  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  1.89.8 
सुखं हि जन्तुर्यदि वापि दु:खं
दैवाधीनं विन्दते नात्मशक्त्या।
तस्माद् दिष्टं बलवन्मन्यमानो
न संज्वरेन्नापि हृष्येत् कथंचित्॥ ८॥
 
 
अनुवाद
जीव को जो सुख या दुःख होता है, वह प्रारब्ध के कारण होता है, अपने बल से नहीं। अतः प्रारब्ध को ही सबसे बलवान मानकर मनुष्य को किसी भी प्रकार से हर्ष या शोक नहीं करना चाहिए ॥8॥
 
The happiness or sorrow that a living being experiences is due to destiny and not by one's own strength. Therefore, considering destiny to be the strongest, a man should not rejoice or grieve in any way. ॥ 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)