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mahabharat 1.89.5: मेरे पास पुण्य रूपी बहुत-सा धन था; किन्तु दूसरों की निन्दा करने से वह सब नष्ट हो गया। अब मैं प्रयत्न करने पर भी उसे पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। जो मेरी व्यथा को समझता है और आत्म-कल्याण में तत्पर रहता है, वही बुद्धिमान और धैर्यवान है ॥5॥   |   mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 89: ययाति और अष्टकका संवाद  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.89.5 
अभूद् धनं मे विपुलं गतं तद्
विचेष्टमानो नाधिगन्ता तदस्मि।
एवं प्रधार्यात्महिते निविष्टो
यो वर्तते स विजानाति धीर:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
मेरे पास पुण्य रूपी बहुत-सा धन था; किन्तु दूसरों की निन्दा करने से वह सब नष्ट हो गया। अब मैं प्रयत्न करने पर भी उसे पुनः प्राप्त नहीं कर सकता। जो मेरी व्यथा को समझता है और आत्म-कल्याण में तत्पर रहता है, वही बुद्धिमान और धैर्यवान है ॥5॥
 
I had a lot of wealth in the form of virtues; but because of criticizing others, all of it got destroyed. Now I cannot get it back even if I try. The one who understands my plight and remains engaged in self-welfare is the wise and the patient one. ॥5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)