Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.89.12: अष्टक! मैं सुख और दुःख दोनों की अनित्यता को जानता हूँ, फिर मैं दुःखी कैसे हो सकता हूँ? मैंने यह चिंता छोड़ दी है कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए जिससे दुःखी न होऊँ। इसलिए सावधान रहकर मैं दुःख और क्लेश को अपने से दूर रखता हूँ॥12॥ | mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अनित्यतां सुखदु:खस्य बुद्ध्वा
कस्मात् संतापमष्टकाहं भजेयम्।
किं कुर्यां वै किं च कृत्वा न तप्ये
तस्मात् संतापं वर्जयाम्यप्रमत्त:॥ १२॥
अनुवाद
अष्टक! मैं सुख और दुःख दोनों की अनित्यता को जानता हूँ, फिर मैं दुःखी कैसे हो सकता हूँ? मैंने यह चिंता छोड़ दी है कि मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए जिससे दुःखी न होऊँ। इसलिए सावधान रहकर मैं दुःख और क्लेश को अपने से दूर रखता हूँ॥12॥
Ashtak! I know the impermanence of both happiness and sorrow, then how can I be distressed? I have given up worrying about what I should do and what I should do to not be distressed. Therefore, being cautious, I keep grief and distress away from me.॥12॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥