Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 1.89.11: स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, मत्स्य आदि जल और पर्वतों में रहने वाले प्राणी, घास और काष्ठ - ये सब प्रारब्ध-भोग के पूर्ण नाश के पश्चात् अपने स्वभाव को प्राप्त होते हैं ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 89: ययाति और अष्टकका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.89.11 
संस्वेदजा अण्डजाश्चोद्भिदश्च
सरीसृपा: कृमयोऽथाप्सु मत्स्या:।
तथाश्मानस्तृणकाष्ठं च सर्वे
दिष्टक्षये स्वां प्रकृतिं भजन्ति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज, सरीसृप, कृमि, मत्स्य आदि जल और पर्वतों में रहने वाले प्राणी, घास और काष्ठ - ये सब प्रारब्ध-भोग के पूर्ण नाश के पश्चात् अपने स्वभाव को प्राप्त होते हैं ॥11॥
 
Svedaja, Andaja, Udbhijja, reptiles, worms, fishes etc. living beings in water and mountains, grass and wood - all these attain their nature after the complete destruction of Prarabdha-Bhog. 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)