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mahabharat 1.89.10: अष्टक! मैं कभी भयभीत नहीं होता, कभी भ्रमित नहीं होता, मुझे कभी कोई मानसिक व्यथा नहीं होती, क्योंकि मेरा विश्वास है कि विधाता मुझे इस संसार में जिस प्रकार रखते हैं, मैं उसी प्रकार रहूँगा॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.89: ययाति और अष्टकका संवाद   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 89: ययाति और अष्टकका संवाद  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.89.10 
भये न मुह्याम्यष्टकाहं कदाचित्
संतापो मे मानसो नास्ति कश्चित्।
धाता यथा मां विदधीत लोके
ध्रुवं तथाहं भवितेति मत्वा॥ १०॥
 
 
अनुवाद
अष्टक! मैं कभी भयभीत नहीं होता, कभी भ्रमित नहीं होता, मुझे कभी कोई मानसिक व्यथा नहीं होती, क्योंकि मेरा विश्वास है कि विधाता मुझे इस संसार में जिस प्रकार रखते हैं, मैं उसी प्रकार रहूँगा॥10॥
 
Ashtak! I am never afraid and never get confused, I never have any mental anguish because I believe that I will remain as the Creator keeps me in this world.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)