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mahabharat 1.87.7: यदि कोई किसी की निन्दा या गाली दे, तो उसे भी बदले में निन्दा या गाली नहीं देनी चाहिए, क्योंकि गाली या निन्दा सहने वाले की आन्तरिक पीड़ा गाली देने वाले या अपमान करने वाले को जला देती है। उसके पुण्य कर्मों को भी नष्ट कर देती है ॥7॥   |   mahabharat अध्याय 1.87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  1.87.7 
आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षत:।
आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति॥ ७॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई किसी की निन्दा या गाली दे, तो उसे भी बदले में निन्दा या गाली नहीं देनी चाहिए, क्योंकि गाली या निन्दा सहने वाले की आन्तरिक पीड़ा गाली देने वाले या अपमान करने वाले को जला देती है। उसके पुण्य कर्मों को भी नष्ट कर देती है ॥7॥
 
If someone criticizes or abuses someone, he should not criticize or abuse in return because the inner pain of the person who tolerates the abuse or slander burns the abuser or insulter. It also takes away his good deeds. ॥ 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)