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mahabharat 1.87.6: जो कभी क्रोध नहीं करता, वह क्रोध करने वालों से श्रेष्ठ है। इसी प्रकार, सहनशील व्यक्ति असहिष्णु व्यक्ति से श्रेष्ठ है, मनुष्य गैर-मनुष्यों से श्रेष्ठ है और विद्वान व्यक्ति मूर्खों से श्रेष्ठ है।   |   mahabharat अध्याय 1.87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.87.6 
अक्रोधन: क्रोधनेभ्यो विशिष्ट-
स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्ट:।
अमानुषेभ्यो मानुषाश्च प्रधाना
विद्वांस्तथैवाविदुष: प्रधान:॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जो कभी क्रोध नहीं करता, वह क्रोध करने वालों से श्रेष्ठ है। इसी प्रकार, सहनशील व्यक्ति असहिष्णु व्यक्ति से श्रेष्ठ है, मनुष्य गैर-मनुष्यों से श्रेष्ठ है और विद्वान व्यक्ति मूर्खों से श्रेष्ठ है।
 
He who never gets angry is better than those who get angry. Similarly, the tolerant is better than the intolerant, humans are better than non-humans and the learned are better than the fools.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)