श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.87.11 
वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति
यैराहत: शोचति रात्र्यहानि।
परस्य नामर्मसु ते पतन्ति
तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु॥ ११॥
 
 
अनुवाद
दुष्ट लोगों के मुख से सदैव कठोर वचन निकलते हैं, जिनसे आहत होकर मनुष्य दिन-रात दुःख और चिंता में डूबा रहता है। वे वचन दूसरों के हृदय पर आघात करते हैं। अतः विद्वान व्यक्ति को चाहिए कि वह दूसरों के प्रति ऐसे कठोर वचनों का प्रयोग न करे। ॥11॥
 
Harsh words always fly from the mouth of wicked people, hurt by which, a person remains immersed in sorrow and worry day and night. Those words strike at the sensitive spots of others. Therefore, a learned person should not use such harsh words towards others. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)