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mahabharat 1.87.10: (अपना आचरण और व्यवहार ऐसा रखो कि) संत न केवल तुम्हारे सामने तुम्हारा आदर करें, बल्कि पीठ पीछे भी तुम्हारी रक्षा करें। दुष्टों द्वारा कही गई अनुचित बातों को सदैव सहन करना चाहिए और सज्जन पुरुषों के सदाचार का आश्रय लेकर संतों जैसा आचरण अपनाना चाहिए॥10॥   |   mahabharat अध्याय 1.87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 87: इन्द्रके पूछनेपर ययातिका अपने पुत्र पूरुको दिये हुए उपदेशकी चर्चा करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  1.87.10 
सद्भि: पुरस्तादभिपूजित: स्यात्
सद्भिस्तथा पृष्ठतो रक्षित: स्यात्।
सदासतामतिवादांस्तितिक्षेत्
सतां वृत्तं चाददीतार्यवृत्त:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
(अपना आचरण और व्यवहार ऐसा रखो कि) संत न केवल तुम्हारे सामने तुम्हारा आदर करें, बल्कि पीठ पीछे भी तुम्हारी रक्षा करें। दुष्टों द्वारा कही गई अनुचित बातों को सदैव सहन करना चाहिए और सज्जन पुरुषों के सदाचार का आश्रय लेकर संतों जैसा आचरण अपनाना चाहिए॥10॥
 
(Keep your conduct and behavior such that) not only do saints respect you in front of you, but they also protect you behind your back. One should always tolerate the wrong things said by evil people and, taking shelter of the good conduct of noble men, one should adopt the behavior of saints.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)