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mahabharat 1.85.6: वह सिंह के समान पराक्रमी और तरुण था। सारी प्रजा उसके अधीन थी और वह धर्म के विरुद्ध न जाकर उत्तम सुख भोगता था।   |   mahabharat अध्याय 1.85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  1.85.6 
स राजा सिंहविक्रान्तो युवा विषयगोचर:।
अविरोधेन धर्मस्य चचार सुखमुत्तमम्॥ ६॥
 
 
अनुवाद
वह सिंह के समान पराक्रमी और तरुण था। सारी प्रजा उसके अधीन थी और वह धर्म के विरुद्ध न जाकर उत्तम सुख भोगता था।
 
He was as valiant as a lion and was a young man. All the subjects were under his control and he enjoyed the best pleasures without going against Dharma. 6.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)