श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 85: राजा ययातिका विषय-सेवन और वैराग्य तथा पूरुका राज्याभिषेक करके वनमें जाना  »  श्लोक 4-5
 
 
श्लोक  1.85.4-5 
अतिथीनन्नपानैश्च विशश्च परिपालनै:।
आनृशंस्येन शूद्रांश्च दस्यून् संनिग्रहेण च॥ ४॥
धर्मेण च प्रजा: सर्वा यथावदनुरञ्जयन्।
ययाति: पालयामास साक्षादिन्द्र इवापर:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वे अतिथियों को अन्न-जल देकर, वैश्यों के धन की रक्षा करके, शूद्रों पर दया करके, लुटेरों को बन्दी बनाकर तथा धर्मपूर्वक सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करके उन्हें प्रसन्न रखते थे। इस प्रकार दूसरे इन्द्र के समान राजा ययाति अपनी समस्त प्रजा का पालन करते थे॥4-5॥
 
He kept the guests happy by giving them food and water, by protecting the wealth of the Vaishyas, by showing mercy to the Shudras, by imprisoning the robbers and by protecting the entire population in a righteous manner. In this way, like another Indra, King Yayati looked after all his subjects.॥ 4-5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)